Sunday, April 7, 2019

महात्मा गाँधी का शिक्षा दर्शन


मोहनदास करमचंद गाँधी जिसे प्यार से ‘बापू’ कहते हैं । इन्हें रविन्द्रनाथ टैगोर ने ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की । राष्ट्रनिर्माण में उत्कृष्ट योगदान देने के कारण इन्हें ‘राष्ट्र का जनक’ भी कहा जाता है । इन्हें सुभाष चन्द्र बोस ने ‘राष्ट्रपिता’ कहा । इस प्रकार इन्हें राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के नाम से भी हम सभी जानते हैं । इनका जन्म 2 अक्टूबर, 1869 में गुजरात के काठियावाड़ जिले के पोरबंदर नामक स्थान में हुआ था । उनके पिता करमचंद गाँधी पोरबंदर रियासत के दीवान थे । वे इमानदार, साहसी और उदार प्रकृति के थे । उनकी माता पुतली बाई साध्वी, श्रद्धालु एवं धर्मपरायण महिला थी । गाँधी जी को बाल्यकाल में ही उन्हें अपने माता-पिता से नैतिक संस्कारों का बहुत गहरा असर पड़ा । सत्य और अहिंसा के अग्रदूत गाँधी जी की जीवन दृष्टि भारत के सामाजिक राजनैतिक और शैक्षिक जन-जीवन को प्रभावित किया । 30 जनवरी, 1948 को वे हमसभी के बीच नहीं रहे ।
भारतीय प्राचीन शिक्षा गुरुकुल प्रणाली की थी । आज की तरह वह व्यावसायिक नहीं थी । गुरुकुल का खर्च गाँव के समृद्ध किसान उठाते थे । गुरुकुल में बच्चे सेवा भाव से शिक्षार्जन करते थे और माता-पिता, गुरु, समाज के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों को समझते हुए समाज और देश के निर्माण में अपना योगदान देते थे । इस तरह की शिक्षा व्यवस्था को गाँधी जी ‘द व्यूटीफुल ट्री’ कहते थे । क्योंकि उन्हें मालूम था कि भारत में शिक्षा सरकारों के बजाय समाज से संचालित होती थी । उन्होंने शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा था कि “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक तथा मनुष्य में निहित शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक श्रेष्ठतम शक्तियों का अधिकतम विकास है । उस शिक्षा से व्यक्ति समाज और देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक दासता का विरोध कर स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर हो सकता है ।” वे शिक्षा को सार्वभौमिक रूप से प्रसारित करना चाहते थे ।
भारत में अंग्रेजों द्वारा विकसित शिक्षा पद्धति कई प्रकार से हमारे लिए हानिकारक थी । उन्होंने हमारी भाषा और संस्कृति को बुरी तरह से प्रभावित किया । गाँधी जी को उनकी शिक्षा पद्धति को लेकर जो खामिया दिखी वे इस प्रकार हैं –
यह विदेशी संस्कृति पर आधारित थी जिसने स्थानीय संस्कृति समाप्त कर दी ।
यह ह्रदय और हाथ की संस्कृति की उपेक्षा कर दिमाग तक सिमित कर देता है ।
विदेशी भाषा के माध्यम से सही शिक्षा संभव नहीं है ।
गाँधी जी अंग्रेजी शिक्षा को मानसिक गुलामी का कारण बताते हुए कहते हैं कि “अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने राष्ट्र को गुलाम बनाया है । अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म, वगैरह बढे हैं ।” इसी यथास्थिति को भांपते हुए वे अंग्रेजो के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया । इस आन्दोलन के तहत गाँधी जी ने हिन्दुस्तानियों से सरकारी संस्थानों के बहिष्कार का आह्वाहन किया । औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली की जगह उन्होंने एक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का विकास किया । इस राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत मानव श्रम को उसका उचित स्थान देते हुए मनुष्य के ह्रदय और मस्तिष्क का समन्वित विकास करना था ।
गाँधी जी एक महान राजनीतिक, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवक, चिन्तक एवं उच्च कोटि के शिक्षा शास्त्री थे । उनका दृढ़ विशवास था कि शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिससे भारतीय समाज उन्नति कर सकता है । उन्होंने शिक्षा पर विशेष बल देकर उसपर कई प्रयोग किये । उन्होंने शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर गहन चिंतन किया और अनेक पुस्तकें भी लिखी । जैसे - सच्ची शिक्षा, शिक्षा की समस्या, शिक्षा नयी तालीम की ओर, हिन्द स्वराज, दिल्ली डायरी, आश्रम वासियों से आदि ।
देश के प्रमुख शिक्षा विदों में गाँधी जी का नाम भी शामिल है । गाँधी जी के शिक्षा सम्बन्धी विचार विभिन्न पक्षों पर इस प्रकार है ।
गाँधी जी ने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है कि “शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक तथा मनुष्य के शारीरिक, मानसिक तथ आत्मा के भीतर विद्यमान गुणों का सब प्रकार से सर्वोत्तम विकास करना है ।” उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि साक्षरता न तो शिक्षा का अंत है और न ही आरम्भ, यह केवल एक साधन है । जिस व्यक्ति को शिक्षित किया जाता है । वे सच्ची शिक्षा के सन्दर्भ में कहते हैं “दिमाग को हाथ के काम द्वारा शिक्षा मिलनी चाहिए । मैं कवि होता तो हाथ की पांच उँगलियों की अद्भुत शक्तियों के बारे में कविता लिखता । दिमाग ही सबकुछ है और हाथ पैर कुछ नहीं, ऐसा आप क्यों मानते हैं ? जो अपने हाथ को शिक्षा नहीं देते, जो शिक्षा की सामान्य रुढ़ि में से होकर निकलते हैं, उनका जीवन नीरस बन जाता है...दिमाग खाली शब्दों से थक जाता है और बच्चे का मन भटकने लगता है । हाथ न करने लायक काम करते हैं, आँखे न देखने लायक चीजें देखती हैं, कान न सुनने लायक बातें सुनते हैं और उनको क्रमशः जो कुछ करना, देखना और सुनना चाहिए, उसे वे करते, देखते और सुनते नहीं हैं...जो शिक्षा हमें अच्छे बुरे का भेद करना एवं अच्छे को ग्रहण करना और बुरे को त्यागना नहीं सिखाती, वह शिक्षा सच्ची शिक्षा नहीं है ।”
गाँधी जी ने अपने शिक्षा दर्शन में बुनियादी शिक्षा की बात की है जिसका अर्थ है जीवन की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी शिक्षा । गाँधी जी का शिक्षा दर्शन उनके दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और इंडिया में मिले अनुभवों पर आधारित है । गाँधी जी सर्वोदय अर्थात सबका हर तरह से कल्याण हो, सबके हित में अपना हित समझना ही सर्वोदय है । वे इस बात को हमेशा ही महत्व देते थे । वे श्रम के प्रति एक उचित नजरिया पैदा करना ही शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मानते थे । उनका मानना था कि शिक्षा का लक्ष्य समाज को संगठित करना तथा श्रम के प्रति उचित दृष्टिकोण पैदा करना होना चाहिए । उनके अनुसार समाज ऐसा हो जिसमें सब मिलकर रह सकें और यह कार्य शिक्षा द्वारा ही संभव था । उन्होंने मेहनत, मजदूरी करने वालों के प्रति सम्मान की भावना से देखने के लिए शिक्षा को एक महत्वपूर्ण औजार माना ।
हमारी शिक्षा सामाजिक जरूरतों का दर्पण होता है । अर्थात, जो शिक्षा है वह समाज की जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए । गाँधी जी का मानना था कि लड़कों को जो कुछ सिखाया जाय वह दस्तकारी उद्योग के माध्यम से सिखाया जाय । वे चाहते थे कि बालक को वर्ण सिखाने से पहले कटाई की कला सिखाई जाय । गाँधी जी शिक्षा में बालक को केंद्र बिंदु मानते थे और ऐसा मानना मनोवैज्ञानिक भी था । हाथ, ह्रदय और मस्तिष्क का समन्वय उनकी शिक्षा का आधार था ।
उनके अनुसार शिक्षित व्यक्ति का मतलब एक आत्मनिर्भर व्यक्ति था अर्थात ‘शिक्षा को ऐसा ही होना चाहिए जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाये’ । शिक्षा एक अहिंसक सामाजिक बदलाव का साधन है ।  उन्होंने स्व-अनुशासन (स्व-अनुशासन के लिए सभी व्यक्तियों के लिए अलग-अलग अर्थ होता है जैसे विद्यार्थियों के लिए इसका अर्थ है सही समय पर एकाग्रता के साथ पढ़ना और दिए गए कार्य को पूरा करना) के बारे में इस प्रकार कहा था कि ‘स्व-अनुशासन किसी पर थोपा नहीं जा सकता । यह दैनिक जरूरतों से पैदा होता है । उन्होंने स्कूलों में लोकतान्त्रिक शिक्षण की वकालत की थी जिससे शिक्षा के सामान्य रूप से लोग जुड़ सके । शिक्षा समाज को बदलने का एक अहिंसक साधन है । गाँधी जी का शिक्षा दर्शन थ्री (एच) पर आधारित है । जहाँ थ्री (एच) का मतलब हैण्ड, हार्ट तथा हेड है ।
गाँधी जी की आस्था आदर्शवाद और प्रयोजनवाद दोनों में ही थी । उनके जीवन के चार स्तम्भ हैं – अहिंसा, निर्भयता, सत्य और सत्याग्रह । महत्वपूर्ण शब्द आदर्शवाद और प्रयोजनवाद को लेकर है । जिनमें गाँधी जी की सबसे बड़ी देन रही है । सामान्यतः हम किसी भी दार्शनिक को किसी न किसी वाद से जोड़कर चलते हैं । गाँधी जी ने यह प्रयास किया है कि शिक्षा दोनों तरफ से होनी चाहिए । आदर्श वाद के रूप में भी जहाँ नैतिक मूल्यों का क्षरण नहीं हो सके और प्रयोजन वाद के रूप में भी जहाँ हम शिक्षा को जीविकोपार्जन का एक साधन बना सकें । इस प्रकार से उन्होंने आदर्शवाद और प्रायोजनवाद दोनों को साथ लेकर शिक्षा की परिचर्चा की ।
शिक्षा का तात्पर्य यह हुआ कि शिक्षा वह है जो ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ बालक व व्यक्ति के व्यवहार में परिमार्जन लाती है । शिक्षा के द्वारा उत्तम नागरिकों का निर्माण होना चाहिए । शिक्षा का माध्यम मातृ भाषा हो और उसका सम्बन्ध वास्तविक परिस्थिति से हो । कर्मेन्द्रियों का विकास करना भी शिक्षा का दायित्व होना चाहिए । पांच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणी, पाद, उपस्थ, पायु) जिसे गाँधी जी ने शिक्षा के सन्दर्भ लिया है वह वास्तव में सांसारिक बंधनों से परे है । जिस विमुक्त की परिकल्पना हमारे शास्त्रों में की गयी है उसको उसने साकार कर दिया ।
गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘मैंने सदैव ह्रदय की संस्कृति अथवा चरित्र निर्माण को प्रथम स्थान दिया है तथा चरित्र निर्माण को शिक्षा का उचित स्थान माना है । शारीरिक एवं बौद्धिक विकास भी शिक्षा का दायित्व है । इसी प्रकार से संस्कृति शिक्षा का आधार व उसका विशेष अंग है । वह भारतीय संस्कृति, शिक्षा के माध्यम से उभरकर सामने आनी चाहिए ।’ ये वाक्य गाँधी जी ने आत्मकथा में लिखा है । उन्होंने उस संस्कृति को परिपुष्ट करने के लिए लिखा है जो हमारी भारतीय संस्कृति है । उन्होंने आगे लिखा है कि शिल्प का चुनाव बच्चों की योग्यता और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के आधार पर किया जाय । शिक्षा को आत्मनिर्भर भी होना चाहिए । इस प्रकार से उन्होंने नैतिक विकास के दायित्वों को शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार माना है ।
   
गरिमा कुमारी
एम्.ए. (हिंदी)

चुटकुले

अध्यापक - अच्छा इंसान वहीं हैं जो दूसरों के काम आए ।
छात्र - पर सर परीक्षा के समय में न आप हमारे काम आते हैं  और
न ही किसी और को आने देते हैं । 😀

Saturday, April 6, 2019

प्रेमचंदपूर्व युगीन प्रमुख उपन्यासों की विशेषताएं



साहित्य की अन्य विधाओं में से उपन्यास एक प्रमुख आधुनिक विधा है। 13वीं सदी में मुद्रणयंत्र का अविष्कार होने से गद्य के विकास में अभूतपूर्व तेजी आई। सामंतवाद के स्थान पर  पूंजीवाद का उदय हुआ और इसी पूंजीवाद के साथ मध्यवर्ग का भी विकास हुआ। इसी मध्यवर्ग की विशालता और बौद्धिक जागरूकता ने विशाल पाठक का रूप ले लिया। 14वीं-15वीं शताब्दी में यूरोप में मध्यवर्गीय पाठक वर्ग पैदा होने से उपन्यास के उदय के लिए बुनियादी संरचना तैयार हो गयी।

भारत में इस प्रकार की परिस्थितियां ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व में आने से शुरू हुई। अंग्रेजों के संपर्क में आनेवाले द्विभाषी एंव उनके एजेंट भारतीय मध्यवर्ग के पूर्वज माने जा सकते हैं। अंग्रेजों के भारत आगमन एवं ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार का भारत के अन्य राज्यों में प्रसार होने के बाद बहुत सारे पाश्चात्य रहन-सहन एंव अंग्रेजी ढंग की शिक्षा से भारतीय प्रभावित हुए। 1765 ई. में कंपनी के एक आदेश के तहत केवल बंगालियों को एजेंट न्युक्त करने का निश्चय हुआ जिसके कारण बंगाल में शिक्षित मध्यवर्ग के उदय में सहायता मिली। भारत के मध्यवर्ग का उदय 1857 ई. के स्वाधीनता संग्राम के बाद ही माना जाता है। अंग्रेजों  के आने से देश में अनेक शिक्षा संस्थायें खुली, पढ़े लिखे लोगो को नौकरियां मिली जिससे खुशहाल मध्यवर्ग के लोगो की संख्या बढ़ने लगी। परिणामस्वरूप अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के कारण ऐसे लोगों को सरकारी नौकरियां मिली और उनका रहन-सहन भी अंग्रेजों जैसा बन गया।

यूरोप में जहाँ पूंजीवाद के विकास के साथ मध्यवर्गीय चेतना जागृत हुई जिसका सटीक चित्रण रिचर्डसन, हेनरीफिल्डिंग, जॉनआस्टिन आदि के उपन्यासों में हुआ है।

भारत में उपन्यास का प्रचलन, विकास एवं सृजन का श्रेय पश्चिमी देशों के लेखकों को ही माना जाता है। पंडित बालकृष्णभट्ट इनकी पुष्टि करते हुए कहते हैं कि “हमलोग जैसा और बातों में अंग्रेजों की नक़ल करते जाते हैं, उपन्यास का लिखना  भी उन्हीं के दृष्टान्त पर सिख  रहे हैं।” हिंदी में उपन्यास का आरंभ भी अंग्रेजी से अनुदित उपन्यासों से माना जाता है। सन् 1853 ई. में वंशीधर द्वारा थार्मस डे  के लोकप्रिय उपन्यास ‘सेंड फोर्ड एंड मर्टन’ का अनुवाद सन् 1879 में किया गया।

भारत में ऐसे अंग्रेज़ी उपन्यासों का प्रभाव सर्वप्रथम बंगाल के पाठकों पर पड़ा जो अंग्रेजी भाषा एवं सभ्यता से अपेक्षाकृत अधिक परिचित थे। वे अंग्रेज़ी भाषा के बंगाली, अंग्रेजी उपन्यासों को पढ़ने  के लिए उत्सुक रहते थे। फोर्ट विलियम कॉलेज ने हिंदी, उर्दू की अनेक गद्य  कथाओं का प्रकाशन 19वीं सदी के प्रथम दशक में किया। परिणामतः बंगाल के मध्यवर्ग में उपन्यास लेखन की रूचि बढ़ने लगी। भारत में उपन्यास लेखन का प्रारम्भ 18वीं शती के उतरार्द्ध में हुआ यधपि इसके लिए परिस्थितियां 50वर्ष पहले से बन रही थी। बंगाल का उच्च्वर्ग अंग्रेजी शिक्षा एवं संस्कृति से प्रभावित होने के कारण उपन्यास के संपर्क में सबसे पहले आया। इसके बाद भारत के अन्य राज्यों के भाषा-भाषी व्यक्ति उपन्यास में रूचि लेने लगे।

प्रमुख उपन्यास एवं उपन्यासकार

इस कालखंड में उपन्यासकारों द्वारा तत्कालीन परिवेश एवं परिस्थिति के अनुसार कुछ महत्वपूर्ण उपन्यास निम्नवत हैं;

देवरानी  जेठानी  की कहानी (1970) - पंडित गौरीदत्त

इस उपन्यास की रचना उपन्यास के रूप में नहीं हुई थी बल्कि बालिकाओं के लिए उपयोगी पाठ्यपुस्तक के रूप में हुई थी यह स्त्रियों के पढ़ने-पढ़ाने तथा उन्हें गृहस्थ धर्म का उपदेश देने के लिए लिखी  गयी थी स्त्रियों के संदर्भ में खुद कथाकार कहते हैं कि “इस पुस्तक में स्त्रियों की ही बोलचाल और वही शब्द जहां जैसा आशय है लिखे हैं और यह वह बोली है जो इस जिले के बनिया के कुटुम में स्त्री-पुरुष व लड़के वाले बोलते चालते हैं... इस पुस्तक में यह भी दरसा दिया है कि इस देश के बनिए जन्म, मरण, विवाह आदि में क्या-क्या करते हैं पढ़ी और बेपढ़ी स्त्रीयों में क्या-क्या अंतर है, बालकों का पालन-पोषण किस प्रकार होता है और किस प्रकार होना चाहिए स्त्रियों का समय किस-किस काम में व्यतीत होता है और क्यों कर  होना उचित है बेपढ़ी स्त्रियां जब एक काम को करती है उसमें क्या-क्या हानि होती है और पढ़ी हुई जब उसी काम को करती है तो उससे क्या-क्या लाभ होता है स्त्रियों की वह बातें जो आजतक नहीं लिखी गयी मैंने खोजकर सब लिख दी है और इस पुस्तक में ठीक-ठीक वही लिखा है जैसा आजतक बनियों के घरों में हो रहा है बाल बराबर भी अंतर नहीं है।” (प्रथम संस्करण की भूमिका) रॉय, गोपाल, हिंदी उपन्यास का इतिहास (पृष्ट संख्या-25)

इस रचना में केवल स्त्री शिक्षा की कहानी नहीं है बल्कि 19 वीं शताब्दी के मध्यवर्गीय बनिया समाज के जीवन का प्रतिनिधि व उसका यथार्थ चित्र भी है। कथाकार ने अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर इस वर्ग की आर्थिक व्यवस्था, रीती-रिवाज, जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार, पुरानी और नई सोच, सामाजिक और धार्मिक विश्वास, नैतिक मूल्य, समाज में व्याप्त अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, अपव्यय, बालविवाह, विधवाओं की दशा आदि का चित्रण किया है। बाद में इस तरह की दो पुस्तकें वामा शिक्षक(1872) और भाग्यवती (1877) लिखे गए। इन कृतियों का उद्देश्य भी स्त्री शिक्षा का विकास और आदर्श स्त्री चरित्र की प्रस्तुति थी।

भाग्यवती(1863) - श्रद्धाराम फुल्लौरी

भाग्यवती का केन्द्रीय कथ्य स्त्री शिक्षा है जिसमें मध्यवर्गीय परिवार की स्त्रियों की हीन  दशा का विस्तृत चित्रण है। वे स्त्रियों की हीन दशा से बहुत चिंतित रहते थे। वे लिखते हैं, “...यद्यपि कई स्त्रियां कुछ पढ़ी लिखी तो होती है परन्तु सदा अपने ही घर में बैठे रहने के कारण उनको देश-विदेश की बोल-चाल और अन्य लोगों से बरत व्यवहार की पूरी बुद्धि नहीं होती।”
इस उपन्यास में कथ्य की कोई नवीनता न होते हुए भी बाल-विवाह, भूत-प्रेत, ओझा-सयानों में विश्वास, बच्चों को टीका न लगवाने, उन्हें जेवर पहनाने, लड़कियों को शिक्षा न देने, शादी विवाह के अवसर पर अपव्यय करने, एलोपैथी डॉक्टरों से इलाज न कराने आदि की आलोचना की गयी है। इसमें काशी के समाज तथा हरिद्वार की कुम्भ मेले की सच्ची तस्वीर भी लेखक ने दिखाई है।

निस्सहाय हिन्दू(1890) - राधाकृष्ण दास

राधाकृष्ण दास का उपन्यास निस्सहाय हिन्दू का केन्द्रीय बिंदु गोवध निवारण पर आधारित है। इसमें हिन्दुओं की निस्सहायता एवं मुसलामानों की धार्मिक कट्टरता का वर्णन है। सांप्रदायिक सद्भाव का ऐसा मार्मिक चित्रण किया है जो इस काल के लिए एक दुर्लभ बात थी। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हिन्दू मुसलामानों की एकता देखकर ब्रिटिश शासन ने उनमें फूट डालकर शासन करने की राजनीति अपनाई थी। दो समाजों में फूट डालने का आसान तरीका धार्मिक भावना को उभारना होता है। 19वीं सदी के सातवें दशक के बाद से अंग्रेज शासक यही कर रहे थे। हिन्दू समाज गौ हत्या के लिए बहुत ही संवेदनशील थे। अंग्रेज स्वयं गौ-मांस खाते थे साथ ही मुसलामानों में भी गौ-मांस खाने का प्रचालन था। हिन्दू और मुसलामानों को भड़काने के लिए इससे अच्छा और कोई तरीका न था। अंग्रेज हिन्दू और मुसलामानों में फूट डालकर राज करना चाहते थे।

          इस उपन्यास में समकालीन राष्ट्रय भावना और नवजागरण की चेतना की अभिव्यक्ति हुई है। यद्यपि उपन्यासकार ने स्पष्टतः ब्रिटिश शासन की आलोचना नहीं की है, पर इस शासन में देश की दुर्दशा, अंग्रेज सरकार की चमचा की करतूतों, अंग्रेजों से डरे हिन्दुस्तानियों की हास्यास्पद हरकतों, टेक्स में निरंतर होती वृद्धि उसकी वसूली में की जाने वाली धांधली, पुलिस थाने में फैले भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता, अंग्रेजों के आवास स्थान, सिविल लाइन्स आदि की आलोचना की गयी है।

परीक्षा गुरु (1882) - लाला श्रीनिवास दास

           लाला श्रीनिवास दास के द्वारा 1882 ई. में परीक्षा गुरु उपन्यास की रचना की गयी। लाला श्रीनिवास दास ने इसे- ‘अनुभव द्वारा उपदेश मिलने की एक संसारी वार्ता’ और ‘अपनी भाषा में एक नयी चाल की पुस्तक’ कहा था। परीक्षा गुरु उपन्यास की कथावस्तु दिल्ली के एक सेठ पुत्र मदनमोहन की कहानी है जो पाश्चात्य सभ्यता एवं भौतिकवादी चकाचौंध से प्रभावित होकर कुसंगति में पड़ गया और अपनी सारी संपत्ति नष्ट कर दी। अंत में उसके एक सज्जन मित्र ब्रजकिशोर ने उसे धीरे-धीरे सुधारने का प्रयास किया तथा अंत में वह सुधर भी गया। इस उपन्यास में ‘अध्याय या परिच्छेद’ के स्थान पर ‘प्रकरण’ शब्द का प्रयोग किया गया है। पांच प्रकरणों में विभक्त परीक्षा गुरु की कथा का घटना काल केवल पांच दिनों का है। परीक्षा गुरु की कथा योजना बहुत कुछ नाटक की वास्तु योजना के समान है। अंत में कथाकार नाटकीय ‘भरत वाक्य’ की तरह पाठकों से कहता है, “जो बात सौ बार समझाने से समझ में नहीं आती वह एक बार की परीक्षा से भली भाँती मन में बैठ जाती है और इसी वास्ते लोग परीक्षा को गुरु मानते हैं।” लेखक का मूल दृष्टिकोण इस उपन्यास में उपदेशात्मक एवं सुधारवादी है।

नूतन ब्रह्मचारी (1886) - बालकृष्ण भट्ट

बालकृष्ण भट्ट के द्वारा 1886 में नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास की रचना की गई। इस उपन्यास का नायक विनायक डाकुओं का ह्रदय परिवर्तन करता है। महाराष्ट्रीय ब्राह्मण विट्ठल राव के पुत्र ब्रह्मचारी विनायक का चित्रण बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। नूतन ब्रह्मचारी लगभग बारह हजार शब्दों की एक लम्बी कथा या अधिक से अधिक ‘उपन्यासिका’ है। इसकी दो विशेषताएं पहली ही दृष्टि में सामने आती है। यह ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसमें 50 वर्ष पूर्व की स्थिति का चित्रण किया गया है। जब भारत पर अंग्रेजों का एकछत्र शासन स्थापित नहीं हुआ था और पिंडारियों की लूटमार से आराजकता फैली हुई थी। इस प्रकार भट्ट जी एक दृष्टि से हिंदी के प्रथम ऐतिहासिक उपन्यासकार माने जा सकते हैं। दूसरी बात यह है कि इसमें भट्ट जी अपने सुपरिचित अवध-गोरखपुर क्षेत्र का कथा-भूमि न बनकर महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र का चित्रण करते हैं। भट्ट जी के पूर्वज मालवा प्रान्त के निवासी थे जहाँ से राजनीतिक आराजकता के कारण भागकर उन्हें उत्तरप्रदेश में बसना पड़ा था।

चंद्रकांता एवं चंद्रकांता संतति (1887) - देवकीनंदन खत्री

उपन्यासों की दुनिया में अपने रचना से धूम मचाने वाले देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता को पढ़ने के लिए अन्य भाषा भाषियों के ह्रदय में हिंदी सिखने की चाह उत्पन्न हो गयी जो अभूतपूर्व घटना हिंदी के विकास में मानी जाती है। चंद्रकांता एवं चंद्रकांता संतति की अभूतपूर्व लोकप्रियता से बाबू  देवकीनंदन खत्री की चर्चा भारत के सभी भाषा-भाषी क्षेत्रों में फैलने लगी।

          तिलस्मी एवं ऐयारी उपन्यासों का मूल आधार ‘तिलस्म होशरुबा’ है। देवकीनंदन खत्री ने इसी को आधार मानकर अपनी प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति ‘चंद्रकांता’ की रचना 1891 में की। इसके अलावा ‘काजर की कोठारी’, ‘भूतनाथ’, ‘कुसुम कुमार’, ‘नरन्द्र मोहिनी’, ‘वीरेन्द्र वीर’ अदि उपन्यासों की रचना की। इन उपन्यासों में घटनाओं का संयोजन इतनी कुशलता से किया गया है कि पाठक की जिज्ञासा अंततक बनी रहती है और वे उपन्यास के ख़त्म होने तक एक जादुई रूप से बंधा होता है। आगे क्या हुआ, तिलस्म कैसे टूटा आदि को लेकर पाठक खाना-पीना, सोना आदि भूल जाते थे। बाबू देवकीनंदन खत्री की यह प्रेमपरक तिलस्मी उपन्यास भले ही साहित्यिक दृष्टि से उच्च कोटि की न हो परन्तु पाठकों को बांधने की शक्ति इसमें बेजोर है। इस उपन्यास का मूल उद्देश्य मनोरंजन ही है। फिर भी यह पाठकों की कौतुहल वृत्ति को जगाकर उन्हें घटनाक्रम में इस तरह बाँध लेता है कि थोड़ी देर के लिए वे अपने आप को विस्मृत कर बैठते हैं। इससे यह सिद्ध होता है इसकी रचना केवल मनोविनोद के लिए ही नहीं है अपितु समाज को नैतिक उपदेश देने एवं पाठकों को रसानुभूति करने के उद्देश्य से भी की गयी है।

श्यामा स्वप्न (1888) - ठाकुर जगमोहन सिंह

ठाकुर जगमोहन सिंह ने इस उपन्यास को ‘गद्य प्रधान चार खण्डों में एक कल्पना’ और ‘एन ओरिजिनल नॉवेल इन हिंदी प्रोज’ की संज्ञा दी है। शिल्प की दृष्टि से यह उपन्यास काफी महत्त्वपूर्ण है। इसका कथा नायक रात्रि के चार प्रहरों में चार स्वप्न देखता है, जो मिलकर एक प्रेम कथा का रूप ग्रहण करता है। स्वप्न के अनेक असंगत बातों के बीच से कथा नायक श्याम सुन्दर और नायिका श्यामा की प्रेम कथा कुछ स्पष्ट होकर सामने आती है। जो प्रेमाख्यानों के अधिक निकट है। कथानायक का चारों स्वप्न एक दूसरे से फिल्म की तरह जुड़ा हुआ है जिससे एक मुकम्मल प्रेमकथा का निर्माण होता है। कथानायक के प्रेम की अभिव्यक्ति यदि स्वप्न के असम्बन्ध बिम्बों के रूप में ही होती तो यह उपन्यास अपने समय का एक क्रांतिकारी  उपन्यास होता। परन्तु ऐसा नहीं हुआ है। इसके बावजूद ‘श्यामा स्वप्न’ की शिल्पगत नवीनता अपनी प्रयोग की दृष्टि से विशिष्ट माना जाता है।

सरकटी लाश (1900) - गोपालराम गहमरी

सरकटी लाश(1900), जासूस की भूल(1901), जासूस पर जासूसी(1904), जासूस की ऐय्यारी आदि रचनाएं जासूसी उपन्यास की श्रेणी में आते हैं। बाबू देवकीनंदन खत्री से प्रभावित होकर ही गोपालराम गहमरी ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया था। इसलिए इनका भी कथालेखन व्यावसायिक था। ये सभी अपने समकालीन पाठकों की कौतुहल जिज्ञासा वृत्ति को जगाकर उनका मनोरंजन करना चाहते थे। जो पाठक  खत्री जी के ऐय्यारी-तिलस्म प्रधान उपन्यासों के रोमांस में लीन था उसके स्वाद को बदलने के लिए गहमरी जी ने अपराध प्रधान और जासूसी कथाएँ उपलब्ध कराई। इनकी कथाओं में प्रेमकथा की जगह अपराध की कथा होती थी। वे अंग्रेजी के जासूसी उपन्यासकार आर्थर कानन डायल से बेहद प्रभावित थे। आधुनिक अपराध शास्त्र और अपराध मनोविज्ञान के विकास में जासूसी कथाओं के लिए इन्होनें अनंत संभावनाएं प्रदान की। इनकी कथाओं में आधुनिकता थी और बौद्धिक क्रीडा के लिए पर्याप्त जगह मौजूद था। शिल्प की दृष्टि से गहमरी जी अपराध प्रधान कथाओं को उस मुकाम तक नहीं पहुंचा पाए जिस मुकाम पर अंग्रेजी के जासूसी उपन्यास थे। उसके सामने इनका शिल्प बहुत साधारण प्रतीत होता है। यही कारण है कि शुक्लजी ने गहमरी जी की जासूसी कथा पुस्तकों को साहित्य कोटि में न रखते हुए अपने इतिहास से बाहर रखा है।

ठेठ हिंदी का ठाठ(1899) - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

अयोध्या सिंह उपाध्याय ने इस उपन्यास का लेखन जॉर्ज ग्रियर्सन के उस अनुरोध पर किया था जो उन्हें खड्ग विलास प्रेस के स्वामी बाबू रामदीन सिंह के नाम से मिला था इस उपन्यास को ‘रानी केतकी की कहानी’ के पूरक के रूप में विद्वानों के द्वारा देखा जाता है। ठेठ हिंदी यानि तद्भव प्रधान हिंदी। विदेशज शब्दों से मुक्त हिंदी। उपन्यास रचना के पीछे का मकसद इसके नाम से ही जाहिर हो जाता है। इस उपन्यास में दो आदर्श प्रिय युवा-युवती की कहानी है। जो समाज की रूढ़ियों और कुरीतियों के कारण चाहकर भी शादी नहीं कर पाते हैं। दोनों के प्रेम में स्वार्थ का नाम नहीं है। पूर्णतः त्यागमय है यह कथा पारंपरिक आदर्शवादी किस्म की ही कहानी कही जाएगी परन्तु इस कहानी का महत्व इस दृष्टि से है कि देवबाला और देवनंदन नामक प्रेम युगल के जरिए कहानी कही गई है जिससे हरिऔध के मानसिक लोक में चलनेवाले उथल-पुथल का अंदाजा भी मिल जाता है उनके पारंपरिक और आदर्शवादी मन में समाज के प्रति विक्षोभ की तरंगे उठने लगी थी। संस्कृत के प्रभाव और आतंक से मुक्त हिंदी का ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ उपन्यास के पहले पृष्ट से ही अत्यंत आकर्षक रूप में प्रतीत होता है ‘सूरज डूबने पर है। बादल की लाली छाई हुई है। बयार जी को ठंडा करते हुए धीरे-धीरे चल रही है। थोरी देर में सूरज डूबा। कुछ झूट पुटा सा हो गया।’ वाकइ यह हिंदी पाठकों के जी को ठंडा करनेवाली कही जाएगी। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से हिंदी बोझिल हो चुकी थी। हिंदी का व्यक्तित्व भी बोझिल हो चुका था उसी की प्रतिक्रिया में हरिऔध जी ने इस उपन्यास की रचना की है।

आदर्श हिन्दू (1914) - मेहता लज्जाराम शर्मा

आदर्श हिन्दू(1914), स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी(1899), आदर्श दंपति(1904), धूर्त रसिकलाल(1889) आदि इनकी कई रचनाएं प्रसिद्ध हैं। लज्जराम शर्मा के उपन्यासों में नई शिक्षा, नवीन आदर्श, पाश्चात्य प्रभावों की निंदा की गयी है तथा सतीप्रथा, पर्दा-प्रथा, अशिक्षा आदि का समर्थन किया गया है ‘सुशीला विधवा ‘ में मध्यवर्ग की रूढ़िवादिता और परम्पराओं के समर्थन का चित्र मिलता है। इसका मुख्य कारण लेखक की सनातन धर्म में अशक्ति है “सुशीला को जिस प्रकार उन्होंने चित्रित किया है, उसमें जीवन की गति नहीं, गतिशुन्यता की चरमसीमा है। वह निर्जीव कठपुतली की भांति उपन्यासकार के संकेतों पर परिक्रमा करती रहती है। उस पर यथार्थ की छाया नहीं, परम्पराओं एवं रुढियों का आभिशाप है।”

          युग अन्य उपन्यासों के अलावा इस कालखंड में और भी कई उपन्यासकारों ने उपन्यासों की रचना की है। अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में रहस्य कथा (1879), एक अजान सौ सुजान(1892), बिगड़े का सुधार (1907), अधखिला फुल आदि। इसी कालखंड में किशोरीलाल गोस्वामी कृत जिन्दे की लाश, तिलस्मी सीसमहल, लीलावती, याकुती तख्ती आदि उल्लेखनीय कृति है तो गोपालराम गहमरी ने जासूसी, एतिहासिक उपन्यास भी लिखे हैं जिनमें प्रणयिनी परिणय, मस्तानी, शर्वरी, प्रेममयी आदि उपन्यास हैं। दुर्गाप्रसाद खत्री का उपन्यास रक्त माल, अद्भूत भूत, भूतनाथ(अंतिम पंद्रह भाग) इनकी रचनाएं हैं। प्रतापनारायण मिश्र की इंदिरा, राधा-रानी आदि। मिश्रबंधु का वीरमनी, विक्रमादित्य, पुष्यमित्र आदि। रामनरेश त्रिपाठी की मारवाड़ी और पिशाचिनी, वीरांगना आदि।

इस प्रकार इस काल खंड के जितने भी उपन्यास रहे हैं वे मुख्यतः सुधारवादी एवं उपदेसवादी प्रवृत्ति से परिचालित थे और उनका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन ही माना जा सकता है। इन विशेषताओं के अलावा भी इस काल में सामाजिक, ऐतिहासिक, तिलस्मी, जासूसी उपन्यासों की रचना काफी प्रचुर मात्र में हुई है। जिसका जन-जीवन से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ता है। तिलस्मी उपन्यासों में यद्यपि प्रेम चित्रण का अवसर भी आ गया है। किन्तु उपन्यासों का मूल उद्देश्य रहस्य, रोमांस की अय्यारी एवं तिलस्मी दुनिया में ले जाकर पाठकों को चमत्कृत करना ही रहा है।

          प्रेमचंद पूर्व हिंदी उपन्यासों के विषय समाज में विभन्न प्रकार के कुप्रथाओं अंधविश्वासों से सम्बंधित रहे हैं। इसके अंतर्गत पर्दा प्रथा, बहु-विवाह, स्त्री-पुरुष समानता का प्रश्न, नारी शिक्षा, अनमेल विवाह आदि रहे हैं। इस कालखंड में ऐतिहासिक उपन्यासों के अंतर्गत सुलतान रजिया बेगम, रंगमहल में हलाहल, नूरजहाँ बेगम व जहाँगीर, कश्मीर पतन, लाल कुंवर व शादी रंगमहल आदि रहे हैं। इसके साथ शुद्ध मनोरंजन परक उपन्यासों में तिलस्मी-ऐय्यारी, चंद्रकांता,चंद्रकांता संतति, जासूसी उपन्यास, घड़े में थाली, आदि रहे हैं। इसके अलावा इस काल में उपन्यासकारों द्वारा अनुदित उपन्यास की भी रचना की गयी है।

सामाजिक उपन्यास – लाला श्रीनिवास दास (1851-1887) का ‘परीक्षा गुरू’, किशोरीलाल गोस्वामी(1865-1932) का ‘लवंग लतिका’, ‘कुसुम कुमारी’, बालकृष्ण भट्ट(1844-1914) की ‘नूतन ब्रह्मचारी’, ‘सौ अजान एक सुजान’, ठाकुर जगमोहन सिंह(18571899), राधाकृष्ण दास(1865-1907) का ‘निस्सहाय हिन्दू’, लज्जाराम शर्मा (1863-1931) का ‘धूर्त रसिक लाल’ एवं ‘स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी’, अयोध्या सिंह उपाध्याय का ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’, और ‘अधखिला फूल’, ‘देवबाल’, श्री मन्नन द्विवेदी(1884-1921) की ‘रामला’ और ‘कल्याणी’  आदि ।

उपर्युक्त सामाजिक उपन्यासों के अतिरिक्त पंडित देवी प्रसाद शर्मा कृत ‘सुन्दर सरोजनी’(1893), श्री बलदेव प्रसाद मिश्र कृत ‘संसार’(1907), श्री इश्वरी प्रसाद शर्मा कृत ‘हिराव्य्मायी’(1908), श्री हरस्वरूप पाठक कृत ‘भारत माता’ (1915) आदि उपन्यास भी हैं।

ऐतिहासिक उपन्यासकिशोरीलाल गोस्वामी की ‘तारा व क्षत्र कुल कमलिनी (1902), ‘कनक कुसुम व मस्तानी’ (1903), ‘सुल्ताना रजिया बेगम व रंग महल में हलाहल’(1904), ‘ह्रदय हारिणी व आदर्श रमणी’(1904), ‘लवंगलता व आदर्श बाला’(1904), ‘मल्लिकादेवी व बंग सरोजनी’(1905), ‘गुलबहार व आदर्श मातृस्नेह’(1916), ‘लखनऊ की कब्र या शाही महलसरा’(1917) आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास हैं। गंगा प्रसाद गुप्त की ‘नूरजहाँ’(1902), ‘वीर पत्नी’ (1903), ‘कुमार सिंह सेनापति’ (1903), ‘हम्मीर’(1903) आदि। जयराम दास गुप्त की ‘कश्मीर पतन’ (1907), ‘नवाबी परिस्तान वा वाजिद अलीशाह’ (1909), ‘कलावती’(1909), ‘मल्काचाँद बीबी’(1909) आदि। श्री बलदेव प्रसाद मिश्र की ‘अनारकली’(1900), पृथ्वीराज चौहान’(1902), ‘पानीपत’(1902)आदि। इसके अलावा बाबू ब्रजनंदन सहाय ने ‘लाल चीन’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास लिखा है।

तिलस्मी ऐयारी- ऐसे उपन्यास जिसमें तिलस्म इमारतों को तोड़कर खजाना प्राप्त करने की कथा रहती है वे उपन्यास तिलस्मी कहलाते हैं। ऐसे कार्य को पूरा करने में नायकों अपने ऐयारों बड़ी सहायता मिलती है। ‘ऐयार’ अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘चपल व्यक्ति’। श्री देवकीनंदन खत्री के अनुसार ‘ऐयार उसको कहते हैं, जो हर एक ‘फन’ जनता हो। शक्ल बदलना और दौड़ना उसका मुख्य कार्य है।’ तिलस्म के साथ ऐयार का सम्बन्ध जुड़ जाने से दोनों को एकसाथ मिलाकर तिलस्मी ऐयारी उपन्यास कहने की परंपरा चल पड़ी।

हिन्दी में तिलस्मी ऐयारी उपन्यासों के प्रवर्तक बाबू देवकीनंदन खत्री हैं। इन्होनें पहले ‘चंद्रकांता’ लिखा। फिर इसके जोरदार स्वागत के पश्चात् ‘चंद्रकांता संतति’(1896), ‘नरेन्द्र मोहिनी’(1893), ‘वीरेन्द्र वीर’(1895), ‘कुसुम कुमारी’(1899) आदि अनेक उपन्यासों की रचना की। इनके अलावा हरेकृष्ण जौहर ने ‘कुसुमलता’, भयानक भ्रम’(1900), ‘नारी पिशाच’(1901), ‘निराला नकाबपोश’(1902), ‘भयानक खून’(1903) आदि हैं।

इन उपन्यासकारों के अलावा किशोरीलाल गोस्वामी ने ‘तिलस्मी शीशमहल’(1905), बाबू देवकीनंदन खत्री के पुत्र दुर्गाप्रसाद खत्री ने ‘भूतनाथ’ और ‘रोहताश मठ’, गुलाबदास का ‘तिलस्मी बुर्ज’, विशेश्वर प्रसाद वर्मा का ‘वीरेन्द्र कुमार’, श्री रामलाल वर्मा का ‘पुतली का महल’ आदि तिलस्मी उपन्यासों की रचना की गयी

जासूसी उपन्यासों के अंतर्गत चोरी, डकैती,व अन्य प्रकार की अपराधिक घटनाओं के तहत अपराधियों की खोज की जाती है। जासूस अनेक प्रकार के कौशल द्वारा अपराधी को पकड़ने का प्रयास करता है और अपराधी घटनाओं को ऐसा उलझता है कि सत्य का पट लगाना कठिन हो जाता है। अपराधी जासूस के साथ-साथ चलता रहता है लेकिन पाठक उसे नहीं समझ पाता लेकिन अंत में जब वही व्यक्ति अपराधी सिद्ध होता है तो पाठक विस्मित हो जाता है। ऐसे विस्मयजन्य आनंद की सृष्टि करना ही इस उपन्यास का लक्ष्य होता है। तिलस्मी ऐयारी उपन्यासों में जादुई तत्वों का प्रयोग होता है तो जासूसी उपन्यासों में बुद्धि कौशल और वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग होता है।

श्री गोपालराम गहमरी(1866-1946) ने 1898 में बांग्ला से ‘हीरे का मोल’ उपन्यास का अनुवाद प्रकशित कराया। इसे पाठकों ने बहुत पसंद किया। इससे उत्साहित होकर गहमरी जीने 1900 ई. में ‘जासूस’ नामक मासिकपत्र निकाला। इसी के प्रभावस्वरूप उन्होंने लगभग दो सौ जासूसी उपन्यास लिखे। इनके उपन्यासों में ‘अद्भुत लाश’(1896), ‘गुप्तचर’(1899), ‘बेकसूर की फांसी’(1900), ‘खुनी कौन’((1900), ‘चक्करदार चोरी’((1901), ‘जासूस पर जासूसी’((1904), ‘गुप्त भेद’(1913), ‘जासूस की ऐयारी’((1914) आदि।

       गोपालराम के गहमरी के अलावा श्री रामलाल वर्मा का ‘चालाक चोर’, ‘जासूस के घर खून’, किशोरी लाल गोस्वामी की ‘जिन्दे की लाश’((1906), जयराम दास का ‘लंगड़ा खुनी’(1907), ‘काला चाँद’ आदि उपन्यास लिखे गए।  

        अनुदित उपन्यास – उपन्यासों के अनुवाद की परंपरा भारतेंदु के समय से ही आरम्भ हो गयी थी। श्री गदाधर सिंह ने रमेशचंद्र दत्त कृत और बंकिम चन्द्रचटर्जी के ‘दुर्गेशनंदनी’ का अनुवाद किया। बाबू राधाकृष्ण दास ने तारकनाथ गांगुली के ‘स्वर्णलता’ का अनुवाद किया। मुंशी हरितनारायण लाल ने स्वर्न्कुअरि के ‘दीप निर्वाण’ का अनुवाद किया। इसी कालखंड में बंकिमचंद्र, रमेशचंद्रदत्त, शरतचंद्र, रविन्द्रनाथ आदि के उपन्यासों के अनुवाद प्रकाशित किये गए। श्रीमती मल्लिकदेवी ने भारतेंदु से प्रेरित होकर मराठी से ‘चंद्रप्रभापूर्ण प्रकाश’ का अनुवाद किया। वहीँ बाबू रामकृष्ण वर्मा ने उर्दू से घटना प्रधान उपन्यासों का नुवाद किया जिसमें ‘अमला वृतांत माला’, ‘ठग वृतांत माला’ आदि का अनुवाद किया।

          उपर्युक्त अनुवाद साहित्य का हिंदी उपन्यास के विकास में एक महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि प्रेमचंद से पहले हिंदी उपन्यास की रचना नवीन सामाजिक मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए आरम्भ हुई थी। परन्तु इस युग में पाठकों की रुचि एवं उनकी शिक्षा का परिष्कार नहीं हुआ था। उपन्यासकारों के पाठक के ऐसे सोये हुए अवस्था को जगाने के बजाय उसे मनोरंजन में ही लगा दिया। परिणामस्वरूप प्रेमप्रधान, रोमांचकारी, साहसिक तथा अद्भुत घटना प्रधान उपन्यासों की भरमार हो गयी। हिंदी कथा साहित्य में तिलस्मी, ऐयारी, जासूसी और साहसिक उपन्यासों की भरमार हो गयी। इस युग के सबसे बड़े उपन्यासकार किशोरीलाल गोस्वामी भी प्रेम, चुहल, रोमांस और कुतूहल के रहस्य लोक के निर्माण में प्रवृत्ति दिखाई दे रहे हैं। औपन्यासिक कलात्मकता की दृष्टि से इस युग का उपन्यास हिंदी कथा साहित्य में उतना महत्व नहीं रखता है। तिलस्मी उपन्यासों में मनोरंजन की प्रधानता है उनका जनजीवन से कोई सरोकार नहीं है। उनमें अतिमानवीयता एवं अस्वाभाविकता है। जो ऐतिहासिक उपन्यास हैं वे केवल नामधारी उपन्यस हैं। हाँ, यदि इस युग के उपन्यासों में यदि साहित्य की स्थायी संपत्ति बनाने योग्य कोई सामग्री है तो वह है इस युग का अनुदित उपन्यास।       

गरिमा कुमारी

सन्दर्भ:
1.   ज्ञानचंद्र जैन, प्रेमचंद पूर्व के हिंदी उपन्यास, प्रकाशन 1998
2.   राजेंद्र प्रसाद शर्मा, हिंदी गद्य के निर्माता पंडित बालकृष्ण भट्ट,
3.   अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्रों का इतिहास
4.   रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास
5.   गोपाल राय, हिंदी उपन्यास का इतिहास
6.   हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, डॉ. रामदरश मिश्र
7.   हिंदी साहित्य के अस्सी वर्ष, श्री शिवदान सिंह चौहान  

गोदान की प्रासंगिकता




कथासम्राट प्रेमचंद एक प्रगतिशील और जनवादी लेखक माने जाते हैं । तत्कालीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने जो कुछ भी देखा, सुना, समझा उसे अपनी रचनाओं के माध्यम से यथावत प्रस्तुत करने का प्रयास किया । उनका उपन्यास ‘गोदान’ यथार्थ पर आधारित सबसे महत्वपूर्ण महाकाव्यात्मक कृति मानी जाती है । वस्तुतः यह एक कृषक जीवन का महाकाव्य है जिसकी रचना प्रेमचंद ने 1936 में की थी । उपन्यास में ग्रामीण स्तर पर किसानों के जीवन की त्रासदी को स्वाभाविक, सरल और सहज रूप में दिखाया गया है ।

आज के सन्दर्भ में गोदान की प्रासंगिकता को नकारा नहीं जा सकता । प्रासंगिकता के सन्दर्भ में रमेश चन्द्र साह लिखते हैं कि ‘रचना के प्रासंगिकता के निष्कर्ष एकहरा नहीं हो सकता, क्योंकि वह रचना की प्रासंगिकता का निष्कर्ष है । जिसका रचनात्मक काव्य संस्कृति के मूल्यों पर भी प्रासंगिक हो । इसके साथ ही साथ वह रचना प्रासंगिक है जो अपने समय की मानव सच्चाइयों का पूरी जटिलता के साथ साक्षात्कार करवाती हो । यह दोहरी प्रासंगिकता रचना की राह में हर अवरोध को, हर रचना द्रोही परिस्थितियों को तोड़नेवाली होंगी और मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाली होगी । जाहिर है कि यह तभी हो सकता है जब रचना समसामयिक ही न हो बल्कि मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता को कुंठित करने वाले हर खतरों की सुध लेने वाली हो । अतीत की वर्तमानता को पहचाननेवाली हो ।’ इसी में वे आगे लिखते हैं कि ‘मानवीय मूल्यों और आचरण की सभ्यता पर अस्तित्व लोक का संकट कितना ही गहरा क्यों न हो जाय, साहित्य की प्रासंगिकता विलुप्त नहीं हो सकती । इसलिए होमर, दांते, शेक्सपियर, टॉलस्टॉय, गोर्की आदि विदेशी तथा वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भारतेंदु, सुशील कुमार, हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, पन्त, दिनकर आदि के साहित्य को अप्रासंगिक मानाने की कोई प्रासंगिकता नहीं ।’
प्रासंगिकता से अभिप्राय होता है वर्तमान के सन्दर्भ में पूर्ववर्ती कृति या कृतिकार की नैतिक या सामाजिक मूल्यों का विवेचन करना । यद्यपि इस प्रासंगिकता शाब्द का प्रयोग समसामयिक साहित्य के सन्दर्भ में किया जा सकता है । परन्तु यह पूर्ववर्ती रचना में अधिक उपयुक्त लगता है । जब भी किसी साहित्यकार की रचना के विषय में प्रासंगिकता के सन्दर्भ में प्रश्न उठाया जाता है तो इसका मुख्य कारण वर्तमान में बदलते मानवीय मूल्य व जीवन दृष्टि से होता है । आज का समाज तेजी से बदल रहा है । आज की जीवन दृष्टि भी हर एक वस्तु का मूल्याङ्कन वर्तमान के सन्दर्भ में ही करने का प्रयास करती है । साहित्य के सन्दर्भ में भी यही बात आती है । अर्थात जो साहित्यिक कृति अपने आप को वर्तमान से जोड़े नहीं रख पाती वह काल कवलित हो जाती है । प्रेमचंद का गोदान वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी अपनी प्रासंगिकता बनाये हुए है । यह रचना अपने रचनाकाल में सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप जितना महत्व रखती है उतनी ही महत्ता आज के परिवेश में भी इसकी बनी हुई है । यद्यपि आज का समाज प्रेमचंद युगीन समाज से विज्ञान और तकनीकी रूप से काफी आगे है ।

किसी भी साहित्यिक रचना के विषय में रचना को लेकर विचार उठना स्वाभाविक है कि जिन जीवन मूल्यों, विचार दर्शनों की स्थापना उस समय के साहित्य में की गयी थी, वर्तमान परिवेश के वे दर्शन और मूल्य कहीं चुक तो नहीं गए । जिन आदर्शों को साहित्य में ढाला गया है, क्या वे आज भी ग्राह्य हैं । इन प्रश्नों के आधार पर पुर्ववर्ती साहित्य पर तीक्ष्ण प्रहार किये गए हैं । देखना यह होता है कि उस साहित्य की प्रमाणिकता कितनी  प्रासंगिक है । इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम प्रेमचंद के गोदान को देखें तो अनेक नवीन और विस्फोटक तत्वों से परिचय होता है और यह भी प्रतीत होता है कि उनका साहित्य उनकी दृष्टियों में कितना नववैचारिकता से संपन्न-समृद्ध एवं प्रासंगिक है ।  
प्रेमचंद ने जिस गाँव का उल्लेख किया उसे हम किसान समाज के विषय में एक लघु संसार की तरह पढ़ सकते हैं । यह समाज अंग्रेजी उपनिवेश वादी शासन के तहत टूटकर बिखर रहा था । इसका केंद्र था किसान । होरी इस उपन्यास का नायक है । लेकिन यह कैसा नायक है जो लगातार मौत से बचना चाहता है पर बच नहीं पाता है और साठ साल का उम्र भी पूरा नहीं कर पाता है । इसी त्रासदी को रामविलास शर्मा ने धीमी नदी का ऐसा बहाव कहा है जिसमे डूब जाने के बाद आदमी की लाश ही बाहर आती है । किसान का जीवन सिर्फ खेती पर निर्भर रहता है । वह सूदखोरों, पुरोहितों एंव रिश्वतखोरों से खून चुसनेवलों से परेशान रहता है ।

             आज भी किसान इन्हीं की गिरफ्त में फंसकर रह जाते हैं । इससे ऊबर नहीं पाते हैं । असल में खेती के संबंध में अंग्रेजों ने जो कुछ शुरू किया था । उसे आज की सरकार दिन-प्रतिदिन बढ़ावा दे रही है । और होरी की मौत में हम आज के किसानों की आत्महत्याओं के रूप में महसूस कर रहे हैं । हम सभी जानते हैं कि अंग्रेजों ने जो व्यवस्था का बंदोबस्त किया उसी के बाद किसानों और केन्द्रीय शासन के बीच का नया वर्ग जमींदार पैदा हुआ । उस जमींदारी व्यवस्था के अनुसार से तो सारे गाँव के किसानो का जीवन संकटमय था । ऐसा एक भी आदमी नहीं था जिसकी उदासी सूरत न हो मानो उसके प्राणों की जगह दर्द ही बैठकर उन्हें कठपुतलियों की भांति नचा रही हो । वे भी चलते-फिरते थे, काम करते थे, घोटते थे, पिसते थे इसीलिए कि घोटना और पिसना उसके नसीब में ही लिखा है । जीवन में न कोई आशा है, न कोई उमंग जैसे उनके जीवन की सुख चैन छीन गई हो और हरियाली मुरझा गई हो । ‘उस समय भारत के अर्थतंत्र के सबसे प्रमुख क्षेत्र के उत्पादकों के ऐसे ही हालात थे । थोड़ी ही देर में इसकी वजह का भी वे संकेत करते हैं।’ अभी तक खलिहानों में अनाज मौजूद है पर किसी के चेहरे पर खुशी नहीं है । बहुत कुछ तो खलिहानों में ही तुलकर महाजनों और कारिंदों की भेट हो चुका है और जो कुछ बचा है, वह भी दूसरों का है । भविष्य अंधकार के समान है । उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझता । उनकी सारी चेतानाएं स्थिर हो चुकी हैं । ध्यान देने की बात यह है कि आज भी ग्रामीण इलाकों में कर्ज का 70% हिस्सा सूदखोरों के पास ही जाता है और उन्हें सदियों पुरानी एक व्यवस्था में बांधे रखता है । किसानों की आत्महत्याओ के पीछे सूदखोरों की मनमानी देखी गयी है ।

उपन्यास का नायक होरी पर यह विपत्ति जिस घटना के कारण घटती है वह उसके बेटे का अंतरजातीय विवाह के कारण है । होरी के बेटे गोबर को दूसरी जाति की एक विधवा लड़की से प्रेम हो जाता है । वह उससे गर्भवती हो जाती है । गोबर उसे छोड़कर भाग जाता है । गर्भवती बहू को होरी और धनिया अपने घर में ही रख लेते हैं । समाज में पंचायती व्यवस्था होती है जो समाज की मान मर्यादा की रक्षा करता है । पंचायती फरमान के अनुसार होरी को जाति से बाहर कर दिया जाता है । सामूहिकता पर आधारित ग्रामीण जीवन में एक-दूसरे के सहयोग के बिना किसान का जीना असंभव हो जाता है । इसलिए जब वह जाति में आने के लिए पंचायतों का पांव पकड़ते हैं तो वही पंचायत साजिशकर उस पर अस्सी रुपये का जुर्माना लगा देता है । जुर्माना अदा करने में उसका सारा अनाज पंचो के घर पहुँच जाता है ।  

यह उपन्यास किसान के क्रमिक दारिद्रीकरण की शोक गाथा है । पांच बीघे खेत का मालिक खेत को देकर मजदूर बन जाता है । उपन्यास का एक जालिम पात्र झिंगुरी सिंह कहता हैं ‘कानून और न्याय उसका है जिसके पास पैसा है । कानून तो है कि महाजन किसी असामी के साथ कड़ाई न करे, कोई जमींदार किसी कास्तकार के साथ सख्ती न करे, मगर होता क्या है । रोज ही देखते हो । जमींदार मुसक बंधवाके पिटवाता है और महाजन लात और जूते से बात करता है । जो किसान पोढ़ा है, उससे न जमींदार बोलता है, न महाजन । ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गर्दन दबाते हैं ।’

            जिस इलाके की कहानी इस उपन्यास में कही गयी है वहां अन्य फसलों से अधिक गन्ने की खेती होती है । गन्ने की पेराई से पारंपरिक तौर पर गुड़ बनाने से नकद रूपया न मिलता था । परिस्थिति में बदलाव आया । चीनी मीलों के खुलने से जिनके मालिक खन्ना साहेब भी अपनी मीलों के चलते इसी अर्थ तंत्र के अंग हैं । वे बैंकर भी हैं और उद्योगपति भी । उनकी मिल में नकद दाम मिलने की आशा किसानों को होती है और उसी के साथ यह भी कि शायद ये पैसे महाजन और सूदखोरों से बच जाय । लेकिन गाँव के सूदखोर मिल के भुगतान होते ही वे कार्यालय के सामने किसानों से अपना कर्ज वसूलकर ही उसे जाने देते हैं । आज भी गन्ना उगाने वाले किसानों के साथ यही होता है ।

ग्रामीण अर्थ तंत्र का ही एक हिस्सा जमींदार भी होता है । उस गाँव के जमींदार रायसाहेब अमरपाल सिंह है । और उनके जरिये प्रेमचंद तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों पर भी टिप्पणी करते हैं क्योंकि किसानों को शोषण करने की जो प्रक्रिया है वह बिना राजनीति के नहीं चल सकती थी । यही प्रेमचंद उस समय के कांग्रेसी राजनीती की आलोचना करते हैं । उनकी आलोचना को समय ने सही साबित किया है । राय साहेब जमींदार हैं और कांग्रेस के नेता भी हैं । वे अंग्रेजों द्वारा स्थापित तत्कालीन भारतीय शासन व्यवस्था में कौंसिल के मेम्बर भी हैं । इसी तरह खन्ना मिल का मालिक और बैंकर होने के साथ ही कांग्रेसी भी है । इस कांग्रेसी राजनीती की आलोचना प्रेमचंद ने धनिया के मुख से करवाया है । वे कहती हैं ‘ये हत्यारे गाँव की मुखिया है, गरीबों का खून चूसने वाले हैं । सूद-व्याज, नजर-नजराना, डेढ़ी-सवाई, घुस-घास जैसे भी हो गरीबों को लूटो । जेल जाने से सूराज न मिलेगा । सूराज मिलेगा धरम से न्याय से ।’

आज भी वर्तमान में भारतीय किसान की दशा होरी जैसी ही है । गोदान का नायक होरी की यातना केवल यहीं तक सीमित नहीं है कि उसे आर्थिक व्यवस्था ने कितना कुचल डाला है बल्कि यह है कि उस अवस्था में वह अपने उन दायित्वों को संपन्न नहीं कर पाता है । वह मरते दम तक गोदान के लिए पैसे भी नहीं जुटा पाता जो उसकी आत्मा को यह लोक न सही परलोक में शांति दे सके । डॉ. रामविलास शर्मा ‘प्रेमचंद और उनका युग में लिखते हैं कि –“प्रेमचंद ने जब गोदान लिखे थे तब वे खुद भी कर्ज से दबे हुए थे । गोदान की मूल समस्या ऋण की समस्या है । इस उपन्यास में किसानों के साथ मानो वह आपबीती भी कह रहे थे ।”

गोदान में होरी के ऊपर जो सामाजिक सांस्कृतिक दबाव प्रेमचंद ने दिखाया है उससे आज भी कोई किसान यदि कोई समझौता करना चाहे तो वह नहीं कर सकता है । आज भी समाज में सामाजिक संस्कृति के तहत हर किसी के ऊपर यह दबाव बना रहता है कि परिवार या समाज में किसी के मरणोपरांत गोदान जैसे कर्मकांड की भूमिका अदा करे अथवा करवाए चाहे वह आर्थिक रूप से कितना ही कमजोर हो । होरी जीतेजी मेहनत करते हुए गाय तो नहीं खरीद पाता है लेकिन उसी पैसे को धार्मिक, सांस्कृतिक विडंबना के तहत मुक्ति की आकांक्षा के लिए ब्राह्मणों को गोदान के लिए देना पड़ता है ।

सामाज में जातिगत भेदभाव भी चरम पर है । होरी और धनिया को इसी जातिगत भेदभाव की वजह से उस समय उसका समाज से हुक्का पानी बंद हो जाता है । जब गोबर झुनिया को प्रेमविवाह के तहत घर लाने के लिए मजबूर हो जाता है तो उसे इसके प्रायश्चित के लिए जुर्माने भी भरने पड़ते हैं । अंतरजातीय विवाह को लेकर प्रेमचंद ने जो इस प्रकार की समस्या दर्शाई है वह आज भी प्रासंगिक है । जो खुले मंच पर अपनी बेटी-रोटी की बात तो खूब सजाकर कहता है परन्तु घर जाकर वह वही करता है जो उसके पूर्वज पहले से करते आये हैं ।

प्रेमचंद ने गोदान में जिस हिन्दू मुस्लिम की संस्कृति से बढ़कर अर्थतंत्र की संस्कृति के बात करते हैं उससे आज भी इनकार नहीं किया जा सकता है । बल्कि अर्थ तंत्र की वह संस्कृति आज भी हमारे समाज पर प्रचंड रूप से हावी है । इसे धर्म की न्यायिक विडंबना ही कहेंगे कि गोदान कि होरी और पंडित दातादीन दोनों की स्थिति एक दूसरे से भिन्न और विरोधी है जो धर्म पंडित दातादीन को प्रभुता संपन्न बनाता है वही धर्म होरी को वंचित और असहाय कर देता है । होरी के जीवन की दो महत्वपूर्ण घटनाएं उसके जीवन को बुरी तरह से झकझोर देती है । एक है उसके द्वार पर खूंटे से बंधी गाय का मरना और दूसरा उनके बेटे द्वारा विधवा झुनिया को बिना व्याह किये पत्नी के रूप में अपना लेना । यद्यपि होरी इन दोनों ही घटनाओं के प्रति जिम्मेदार नहीं है इसके बावजूद धर्म विरादरी और मर्यादा के तहत उसपर समाज द्वारा जुर्माना लगाया जाता है । जिससे वह कर्ज के दुश्चक्र में फंस जाता है । परिणामतः इस दुश्चक्र से निकलने के लिए अंततः अपने जमीन जायदाद गिरवी रखकर किसान से मजदूर बनने के लिए मजबूर हो जाता है । आज भी भारतीय किसान ऐसी अर्थ संस्कृति के हिस्से से इनकार नहीं कर सकता है ।

गोदान में प्रेमचंद ने नारी विमर्श को लेकर भी काफी सजगता के साथ पात्रों का नियोजन कर अपनी बातों को कहने का प्रयास किया है । उपन्यास में दलित एवं किसान पृष्ठभूमि की स्त्रियाँ अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं अधिकारों के प्रति सजग है । धनिया के अलावा झुनिया, नोहरी, सोना आदि कई ऐसे स्त्री पात्र हैं जो नारी अस्मिता के मुखर आवाज हैं । नारी की जिस स्थिति को तत्कलीन रचनाकार मैथलीशरण गुप्त अपनी यशोधरा में यह कहकर व्यक्त करते है कि ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में हो दूध और आँखों में पानी ।’ उसी समय प्रेमचंद नारी की ऐसी छवि को इनकार करते हुए बिना किसी नारे बाजी और मुहावरे से पात्रों के द्वारा प्रतिरोध व्यक्त करवाया है । पंडित जी द्वारा छेड़छाड़ किये जाने पर झुनिया कहती है “इस फेर में न रहना पंडित जी ! मैं अहीर की लड़की हूँ । मूंछ का एक-एक बाल नुचवा लुंगी । यही लिखा है तुम्हारे पोथी-पथरे में कि दूसरे की बहु बेटी को अपने घर में बंद करके बेज्जित करे ।...हांडी उसके मुंह पर दे मारी ।”

प्रेमचंद नारी के सशक्तिकरण को लेकर कहते हैं कि “अपने को मिटाने से काम न चलेगा । नारी को समाज कल्याण के लिए अपने अधिकारों की रक्षा करनी पड़ेगी । उसी तरह जैसे- इन किसानों को अपनी रक्षा के लिए इस देवत्व का कुछ त्याग करना पड़ेगा ।” 

प्रेमचंद का नारीवादी दृष्टिकोण एकालवादी के बजाय भारतीय सामाजिक संरचना के अनुकूल बहुलवादी है । पितृसत्तात्मक व्यवस्था के तहत अनुकूलन की स्थिति में वहां नारी मुक्ति की छटपटाहट है जहाँ विवाह की आलोचना करते हैं वहीं वे उसके महत्व को भी रेखांकित करते हैं । आज जिस लिव-इन-रिलेशनशिप को लेकर युवाओं में मुक्ताकंक्षा है । इसी मुक्ताकंक्षा को प्रेमचंद ने मेहता और मालती के बीच आपसी संवाद और सम्बन्ध को दर्शाकर आधुनिक युवा मानसिकता को व्यक्त किया है । प्रेमचंद ने नारीवाद का कोई मॉडल तो प्रस्तुत नहीं किया है लेकिन भारतीय समाज की नारी की दशा का यथार्थ स्थिति को प्रस्तुत कर उसकी भूमिका को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखांकित जरूर किया है । स्त्री-पुरुष को लेकर विवाह प्रेम, तलाक, प्लेटोनिक लव का छलावा आदि मनः स्थितियों को प्रेमचंद ने जिस दूरदर्शिता के साथ व्यक्त किया है वह आज भी प्रासंगिक है ।

                                    
                                                                                       गरिमा कुमारी 



संदर्भ सूची                                                                                                                                                                                            
1.    प्रेमचंद, गोदान
2.    डॉ. रामविलास शर्मा – प्रेमचन्द और उनका युग
3.    विभिन्न वेब स्रोत

नवसृष्टि संवत्सर व नववर्ष 2076 की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं




        नवसृष्टि संवत्सर व नव वर्ष २०७६ की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
विक्रमी संवत् २०७६
दिनांक - ६ अप्रैल शनिवार २०१९ ई.
  सनातन प्रकल्प -
       १.सृष्टि संवत्
       २.मनुष्य उत्पत्ति संवत्
       ३.वेद संवत्
       ४.देववाणी भाषा संवत्
       ५.सम्पूर्ण प्राणी उत्पत्ति संवत्
     
ऐतिहासिक प्रकल्प -                                                                               १.विक्रम संवत
  २.शक संवत्
   ३.आर्य सम्राट विक्रमादित्य जन्मदिवस
   ४.युधिष्ठिर राज्याभिषेक दिवस
   ६.आर्यसमाज स्थापना दिवस- दयानंद सरस्वती

   चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव वर्ष प्रारंभ होता है। इसी दिन सूर्योदय के साथ सृष्टि का प्रारंभ परमात्मा ने किया था। अर्थात् इस दिन सृष्टि प्रारंभ हुई थी तब से यह गणना चली आ रही है।                                                                                                         यह नववर्ष किसी जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं है, अपितु यह मानव मात्र का नववर्ष है। यह पर्व विशुद्ध रुप से भौगोलिक पर्व है। क्योकि प्राकृतिक दृष्टि से भी वृक्ष वनस्पति फूल पत्तियों में भी नयापन दिखाई देता है। वृक्षों में नई-नई कोपलें आती हैं। वसंत ऋतु का वर्चस्व चारों ओर दिखाई देता है। मनुष्य के शरीर में नया रक्त बनता है। हर जगह परिवर्तन एवं नयापन दिखाई पडता है। रवि की नई फसल घर में आने से कृषक के साथ संपूर्ण समाज प्रसन्नचित होता है। वैश्य व्यापारी वर्ग का भी इकोनॉमिक दृष्टि से मार्च महीना इण्डिंग (समापन) माना जाता है। इससे यह पता चलता है कि जनवरी साल का पहला महीना नहीं है पहला महीना तो चैत्र है जो लगभग मार्च-अप्रैल में पड़ता है। १ जनवरी में नया जैसा कुछ नहीं होता किंतु अभी चैत्र माह में देखिए नई ऋतु, नई फसल, नई पवन, नई खुशबू, नई चेतना, नया रक्त, नई उमंग, नया खाता, नया संवत्सर, नया माह, नया दिन हर जगह नवीनता है। यह नवीनता हमें नई उर्जा प्रदान करती है।                                                                    नव वर्ष को शास्त्रीय भाषा में नवसंवत्सर (संवत्सरेष्टि) कहते हैं। इस समय सूर्य मेष राशि से गुजरता है इसलिए इसे "मेष संक्रांति" भी कहते हैं।                                 प्राचीन काल में नव-वर्ष को वर्ष के सबसे बड़े उत्सव के रूप में मनाते थे। यह रीत आजकल भी दिखाई देती है जैसे महाराष्ट्र में गुडीपाडवा के रुप में मनाया जाता है तथा बंगाल में पइला पहला वैशाख और गुजरात आदि अनेक प्रांतों में इसके विभिन्न रूप हैं।

नववर्ष का प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व-

१.आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही परम पिता परमात्मा ने १९६०८५३१२० वर्ष पूर्व यौवनावस्था प्राप्त मानव की प्रथम पीढ़ी को इस पृथ्वी माता के गर्भ से जन्म दिया था। इस कारण यह "मानव सृष्टि संवत्" है।
२. इसी दिन परमात्मा ने अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा चार ऋषियों को समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल रूप में संदेश क्रमशः ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद के रूप में दिया था। इस कारण इस वर्ष को ही वेद संवत् भी कहते हैं।                        ३. आज के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त कर वैदिक धर्म की ध्वजा फहराई थी। (ज्ञातव्य है कि भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल षष्ठी को हुआ था ना की प्रतिपदा अथवा दीपावली पर) (विजयादशमी व दीपावली का श्रीराम से कोई संबंध नहीं है देखे श्रीमद् वाल्मीकि रामायण)
४. आज ही से कली संवत् तथा भारतीय विक्रम संवत् युधिष्ठिर संवत् प्रारंभ होता है।
५.आज ही के शुभ दिन विश्व वंद्य अद्वितीय वेद द्रष्टा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने संसार में वेद धर्म के माध्यम से सब के कल्याणार्थ "आर्य समाज" की स्थापना की थी। इसी भावना को ऋषि ने आर्य समाज के छठे नियम में अभिव्यक्त करते हुए लिखा "संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना"                                                                    l  महानुभावों! इन सब कारणों से यह संवत् केवल भारतीय या किसी पंथ विशेष के मानने वालों का नहीं अपितु संपूर्ण विश्व मानवों के लिए है।

आइए! हम सार्वभौम संवत् को निम्न प्रकार से उत्साह पूर्वक  मनाएं -

१. यह संवत् मानव संवत् है इस कारण  हम सब स्वयं को एक परमात्मा की संतान समझकर मानव मात्र से प्रेम करना सीखें। जन्मना ऊंच-नीच की भावना, सांप्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयता, संकीर्णता आदि भेदभाव को पाप मानकर विश्वबंधुत्व एवं प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव जगाएं। अमानवीयता व दानवता का नाश तथा मानवता की रक्षा का व्रत लें।
२. आज वेद संवत् भी प्रारंभ है। इस कारण हम सब अनेक मत पंथों के जाल से निकलकर संपूर्ण भूमंडल पर एक वेद धर्म को अपनाकर प्रभु कार्य के ही पथिक बनें। हम भिन्न-भिन्न समयों पर मानवों से चलाए पंथों के जाल में न फसकर मानव को मानव से दूर न करें। जिस वेद धर्म का लगभग २ अरब वर्ष से सुराज्य इस भूमंडल पर रहा उस समय (महाभारत से पूर्व तक) संपूर्ण विश्व त्रिविध तापों से मुक्त होकर मानव सुखी समृद्धि व आनंदित था। किसी मजहब का नाम मात्र तक ना था। इसलिए उस वैदिक युग को वापस लाने हेतु सर्वात्मना समर्पण का व्रत लें। स्मरण रहे धर्म मानव मात्र का एक ही है, वह है वैदिक धर्म।
३.वैदिक धर्म के प्रतिपालक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विजय दिवस पर हम आज उस महापुरुष की स्मृति में उनके आदर्शों को अपनाकर ईश्वर भक्त, आर्य संस्कृति के रक्षक, वेद भक्त, सच्चे वेदज्ञ गुरु भक्त, मित्र व भातृवत्सल, दुष्ट संहारक, वीर, साहसी, आर्य पुरुष व प्राणी मात्र के प्रिय बने। रावण की भोगवादी सभ्यता के पोषक ना बनें।
४. आज राष्ट्रीय संवत् पर महाराज युधिष्ठिर विक्रमादित्य आदि की स्मृति में अपने प्यारे आर्यावर्त भारत देश की एकता अखंडता एवं समृद्धि की रक्षा का व्रत लें। राष्ट्रीय स्वाभिमान का संचार करते हुए देश की संपत्ति की सुरक्षा संरक्षा के व्रति बनें। जर्जरीभूत होते एवं जलते उजड़ते देश में इमानदारी, प्राचीन सांस्कृतिक गौरव, सत्यनिष्ठा, देशभक्ति, कर्तव्यपरायणता व वीरता का संचार करें।
५. आज आर्य समाज स्थापना दिवस होने के कारण "कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" वेद के आदेशानुसार सच्चे अर्थों में आर्य बनें एवं संसार को आर्य बनाए न की नामधारी आर्य। आर्य शब्द का अर्थ है- सत्य विज्ञान  न्याय से युक्त वैदिक अर्थात ईश्वरीय मर्यादाओं का पूर्ण पालक, सत्याग्रही, न्यायकारी, दयालु, निश्छल, परोपकारी, मानवतावादी व्यक्ति। इस दिवस पर हम ऐसा ही बनने का व्रत लें तभी सच्चे अर्थों में आर्य (श्रेष्ठ मानव) कहलाने योग्य होंगे। आर्यत्व आत्मा व अंतःकरण का विषय है। न कि कथन मात्र का।


       आइये ! संसार भर के प्यारे मित्रों विचारिये कि क्या नव वर्ष सब को मनाना योग्य नहीं है ? तब आइए जागीये तथा अपने धर्म व कर्तव्य को स्मरण करके अपने अपने दोषों को दूर करने तथा सत्य गुण ग्रहण करने का व्रत लेकर उपर्युक्त पांच विधियों से नव वर्ष का स्वागत घर में यज्ञ करके करें, घरों के ऊपर ओम का ध्वज लगाएं, रात्रि में घी के दीपक जलाएं। परमात्मा हम सब मानवों   को ऐसी ही सुमति व शक्ति प्रदान करें।यह नव वर्ष आपके जीवन को सुख-समृद्धि ऐश्वर्य से भरने वाला हो।

       पुनः आप सभी को  नव वर्ष की  बधाई और शुभकामनायें।